ए माटी के पीरा ल कतेक बतांव,
कोनो संगी-संगवारी ल खबर नइए।
ए तो लछमी कस गहना म लदे हे तभो,
एकर बेटा बर छइहाँ खदर नइए।।
कोनो आथे कहूँ ले लाँघन मगर,
इहाँ खाथे ससन भर फेर सबर नइए।…
अइसे होना तो चाही विकास गजब,
फेर खेती ल उजारे के डगर नइए।…
धन-जोगानी चारों खुँट बगरे हे तभो,
एकर कोरा म खेलइया के कदर नइए।…
दुख-पीरा के चरचा तो होथे गजब,
फेर सुवारथ के आगू म वो जबर नइए।…
अइसन मनखे ल मुखिया चुनथन काबर,
जेला गरब-गुमान के बतर नइए।…
लहू तो बहुतेच उबलथे तभो,
फेर कहूँ मेर कइसे गदर नइए।…
सुख-शांति के गोठ तो होथे गजब,
फेर पीरा के भोगइया ल असर नइए।…
सुशील भोले
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